भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

तारा गन्दै रातमा / रमेश क्षितिज

Kavita Kosh से
Sirjanbindu (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 09:53, 25 जुलाई 2017 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार= रमेश क्षितिज |अनुवादक= |संग्रह=आफ...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


यौटा यस्तो खुसी गयो आफूभन्दा प्यारो
दिन त बित्छ यसै उसै रातै काट्न गाह्रो

दिनभरि मुस्काइरहेँ भित्र कहीँ घाउ छोपी
एक्लो रात फेरि आयो मझेरीमा शून्य बोकी
धेरैधेरै भोगीहेरेँ बेहोसीको मात
तारा कति गनिसकेँ काटिँदैन रात

मेरो खुसी पैँचो दिएँ अरूलाई अप्ठ्यारोमा
खोजी हेर्दा ऐले आफ्नै छाया छैन अँध्यारोमा
सारा मेरा साथ छुटे सुनसान भो साथी
औँलाहरू सल्बलाए फेरि घाउमाथि !