भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

तुझसे जुदा हो जाना उलझन जैसा है / सूफ़ी सुरेन्द्र चतुर्वेदी

Kavita Kosh से
अनिल जनविजय (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 21:42, 16 नवम्बर 2014 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=सूफ़ी सुरेन्द्र चतुर्वेदी |अनुव...' के साथ नया पन्ना बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

तुझसे जुदा हो जाना उलझन जैसा है ।
ये ख़याल भी अब तो दुश्मन जैसा है ।

साथ चलूँ तो लगे बुजुर्गों जैसा तू,
मुड़कर मैं देखूँ तो बचपन जैसा है ।

साँसों में ’दिन-रात’ महकते रहते हैं,
कोई तो है जो मुझमें चन्दन जैसा है ।

दिन तो लगता है जैसे क़व्वाली हो,
रात में तेरा नाम कीर्तन जैसा है ।

करे अगर महसूस तो हर अहसास मेरा,
महलों में मिट्टी के आँगन जैसा है ।

झुलसे हुए बदन और जलते मौसम में,
मुझमें तेरा होना सावन जैसा है ।

आकर जबसे तूने पहना है मुझको,
बदन मेरा बस किसी पैरहन[1] जैसा है ।

शब्दार्थ
  1. कपड़े