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तुम्हारा रुख़ बदल जाने से दिल में आस उग आई / ओम प्रकाश नदीम

तुम्हारा रुख़ बदल जाने से दिल में आस उग आई ।
ज़मीं सूखी थी पानी पा गई तो घास उग आई ।

सुना है मज़हबों ने बीज बोए थे मोहब्बत के,
कहाँ से फिर ये नफ़रत भी उसी के पास उग आई ।

अभी अच्छी तरह जिद्दत पनपने भी न पाई थी,
अचानक ज़ह्न में अज्दाद की बू-बास उग आई ।

ये मंज़र देखने की ताब भी लानी पड़े शायद,
जहाँ पर फर्श पक्की थी वहाँ भी घास उग आई ।

ज़माने का असर आब-ओ-हवा पर पड़ गया ज़ालिम,
उमीदों ही के साए में निगोडी यास उग आई ।

जहाँ सहरा है सोचो तो वहाँ का हाल क्या होगा,
जहाँ दरियादिली थी अब वहाँ भी प्यास उग आई ।