भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

तू कान का कच्चा है... / अमजद हैदराबादी

Kavita Kosh से
Dkspoet (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 23:14, 4 नवम्बर 2009 का अवतरण

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

तू कान का कच्चा है तो बहरा हो जा,
बदबीं[1] है अगर आँख तो अन्धा हो जा।
गाली-गै़बत[2] दरोग़गोई[3] कब तक?
‘अमजद’ क्यों बोलता है, गूँगा हो जा॥

मत सुन परदेकी बात बहरा हो जा,
मत कह इसरोरे-ग़नी[4] गूँगा हो जा।
वो रूए लतीफ़[5] और यह नापाक नज़र,
‘अमजद’ क्यों देखता है अन्धा हो जा॥

शब्दार्थ
  1. कुदृष्टि
  2. पीठ पीछे बुराई करने की आदत
  3. असत्य सम्भाषण
  4. शत्रु का भेद
  5. सुशील पवित्र नारी का कोमल देह