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तृतीय अंक / भाग 2 / रामधारी सिंह "दिनकर"

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फिर क्षुधित कोई अतिथि आवाज देता
फिर अधर-पुट खोजने लगते अधर को,
कामना छूकर त्वचा को फिर जगाती है,
रेंगने लगते सहस्रों सांप सोने के रुधिर में,
चेतना रस की लहर में डूब जाती है
 
और तब सहसा
न जानें , ध्यान खो जाता कहाँ पर.
सत्य ही, रहता नहीं यह ज्ञान,
तुम कविता, कुसुम, या कामिनी हो
आरती की ज्योति को भुज में समेटे
मैं तुम्हारी ओर अपलक देखता एकांत मन से
रूप के उद्गम अगम का भेद गुनता हूँ .
 
सांस में सौरभ, तुम्हारे वर्ण में गायन भरा है,
सींचता हूँ प्राण को इस गंध की भीनी लहर से,
और अंगों की विभा की वीचियों से एक होकर
मैं तुम्हारे रंग का संगीत सुनता हूँ
 
और फिर यह सोचने लगता, कहाँ ,किस लोक में हूँ ?
कौन है यह वन सघन हरियालियों का,
झूमते फूलों, लचकती डालियों को?
कौन है यह देश जिसकी स्वामिनी मुझको निरंतर
वारुणी की धार से नहला रही है ?
कौन है यह जग, समेटे अंक में ज्वालामुखी को
चांदनी चुमकार कर बहला रही है ?
 
कौमुदी के इस सुनहरे जाल का बल तोलता हूँ,
एक पल उड्डीन होने के लिए पर खोलता हूँ.
 
पर, प्रभंजन मत्त है इस भांति रस-आमोद में,
उड़ न सकता, लौट गिरता है कुसुम की गोद में.
 
टूटता तोड़े नहीं यह किसलयों का दाम,
फूलों की लड़ी जो बांध गई, खुलती नहीं है.
 
कामनाओं के झकोरे रोकते हैं राह मेरी,
खींच लेती है तृषा पीछे पकड़ कर बांह मेरी.
 
सिन्धु-सा उद्दाम, अपरम्पार मेरा बल कहाँ है?
गूँजता जिस शक्ति का सर्वत्र जयजयकार,
उस अटल संकल्प का संबल कहाँ है?
 
यह शिला-सा वक्ष, ये चट्टान-सी मेरी भुजाएं
सूर्य के आलोक से दीपित, समुन्नत भाल,
मेरे प्राण का सागर अगम, उत्ताल, उच्छल है.
 
सामने टिकते नहीं वनराज, पर्वत डोलते हैं,
कांपता है कुण्डली मारे समय का व्याल,
मेरी बांह में मारुत, गरुड़, गजराज का बल है.
 
मर्त्य मानव की विजय का तूर्य हूँ मैं,
उर्वशी! अपने समय का सूर्य हूँ मैं.
अंध तम के भाल पर पावक जलाता हूँ,
बादलों के सीस पर स्यंदन चलाता हूँ
 
पर, न जानें, बात क्या है !
इन्द्र का आयुध पुरुष जो झेल सकता है,
सिंह से बाँहें मिलाकर खेल सकता है,
फूल के आगे वही असहाय हो जाता ,
शक्ति के रहते हुए निरुपाय हो जाता.
 
विद्ध हो जाता सहज बंकिम नयन के बाण से
जीत लेती रूपसी नारी उसे मुस्कान से.
 
मैं तुम्हारे बाण का बींधा हुआ खग
वक्ष पर धर शीश मरना चाहता हूँ.
मैं तुम्हारे हाथ का लीला कमल हूँ
प्राण के सर में उतरना चाहता हूँ.
 
कौन कहता है,
तुम्हें मैं छोड़कर आकाश में विचरण करूंगा ?
 
बाहुओं के इस वलय में गात्र की बंदी नहीं है,
वक्ष के इस तल्प पर सोती न केवल देह ,
मेरे व्यग्र, व्याकुल प्राण भी विश्राम पाते हैं.
 
मर्त्य नर को देवता कहना मृषा है,
देवता शीतल, मनुज अंगार है.
 
देवताओं की नदी में ताप की लहरें न उठतीं,
किन्तु, नर के रक्त में ज्वालामुखी हुंकारता है,
घूर्नियाँ चिंगारियों की नाचती हैं,
नाचते उड़कर दहन के खंड पत्तों-से हवा में,
मानवों का मन गले-पिघले अनल की धार है.
 
चाहिए देवत्व,
पर, इस आग को धर दूँ कहाँ पर?
कामनाओं को विसर्जित व्योम में कर दूँ कहाँ पर?
 
वह्नि का बेचैन यह रसकोष, बोलो कौन लेगा ?
आग के बदले मुझे संतोष ,बोलो कौन देगा?
 
फिर दिशाए मौन, फिर उत्तर नहीं है
 
प्राण की चिर-संगिनी यह वह्नि,
इसको साथ लेकर
भूमि से आकाश तक चलते रहो.
मर्त्य नर का भाग्य !
जब तक प्रेम की धारा न मिलती,
आप अपनी आग में जलते रहो.
 
एक ही आशा, मरुस्थल की तपन में
ओ सजल कादम्बिनी! सर पर तुम्हारी छांह है.
एक ही सुख है, उरस्थल से लगा हूँ,
ग्रीव के नीचे तुम्हारी बांह है.
 
इन प्रफुल्लित प्राण-पुष्पों में मुझे शाश्वत शरण दो,
गंध के इस लोक से बहार न जाना चाहता हूँ.
मैं तुम्हारे रक्त के कान में समाकर
प्रार्थना के गीत गाना चाहता हूँ.

उर्वशी
स्वर्णदी, सत्य ही, वह जिसमें उर्मियाँ नहीं, खर ताप नहीं
देवता, शेष जिसके मन में कामना, द्वन्द्व, परिताप नहीं
पर, ओ, जीवन के चटुल वेग! तू होता क्यों इतना कातर ?
तू पुरुष तभी तक, गरज रहा जब तक भीतर यह वैश्वानर.
जब तक यह पावक शेष, तभी तक सखा-मित्र त्रिभुवन तेरा,
चलता है भूतल छोड़ बादलों के ऊपर स्यन्दन तेरा.
जब तक यह पावक शेष, तभी तक सिन्धु समादर करता है,
अपना मस्तक मणि-रत्न-कोष चरणों पर लाकर धरता है.
पथ नहीं रोकते सिंह, राह देती है सघन अरण्यानी
तब तक ही शीष झुकाते हैं सामने प्रांशु पर्वत मानी.
सुरपति तब तक ही सावधान रहते बढकर अपनाने को,
अप्सरा स्वर्ग से आती है अधरों का चुम्बन पाने को.
जब तक यह पावक शेष, तभी तक भाव द्वन्द्व के जगते हैं,
बारी-बारी से मही, स्वर्ग दोनों ही सुन्दर लगते हैं
मरघट की आती याद तभी तक फुल्ल प्रसूनों के वन में
सूने श्मशान को देख चमेली-जूही फूलती हैं मन में
शय्या की याद तभी तक देवालय में तुझे सताती है,
औ’ शयन कक्ष में मूर्त्ति देवता की मन में फिर जाती है.
किल्विष के मल का लेश नहीं, यह शिखा शुभ्र पावक केवल,
जो किए जा रहा तुझे दग्ध कर क्षण-क्षण और अधिक उज्ज्वल.
जितना ही यह खर अनल-ज्वार शोणित में उमह उबलता है.
उतना ही यौवन-अगुरु दीप्त कुछ और धधक कर जलता है.
मैं इसी अगुरु की ताप-तप्त, मधुमयी गन्ध पीने आई,
निर्जीव स्वर्ग को छोड़ भूमि की ज्वाला में जीने आई

बुझ जाए मृत्ति का अनल, स्वर्गपुर का तू इतना ध्यान न कर
जो तुझे दीप्ति से सजती है, उस ज्वाला का अपमान न कर.
तू नहीं जानता इसे, वस्तु जो इस ज्वाला में खिलती है,
सुर क्या सुरेश के आलिंगन में भी न कभी वह मिलती है.
यह विकल, व्यग्र, विह्वल प्रहर्ष सुर की सुन्दरी कहां पाए ?
प्रज्वलित रक्त का मधुर स्पर्श नभ की अप्सरी कहां पाए ?
वे रक्तहीन,शुची, सौम्य पुरुष अम्बरपुर के शीतल, सुन्दर,
दें उन्हें किंतु क्या दान स्वप्न जिनके लोहित, संतप्त, प्रखर?
यह तो नर ही है, एक साथ जो शीतल औए ज्वलित भी है,
मन्दिर में साधक-व्रती, पुष्प-वन में कन्दर्प ललित भी है.
योगी अनंत, चिन्मय, अरुप को रूपायित करने वाला,
भोगी ज्वलंत, रमणी-मुख पर चुम्बन अधीर धरने वाला;
मन की असीमता में, निबद्ध नक्षत्र, पिन्ड, ग्रह, दिशाकाश,
तन में रसस्विनी की धारा, मिट्टी की मृदु, सोन्धी सुवास;
मानव मानव ही नहीं, अमृत-नन्दन यह लेख अमर भी है,
वह एक साथ जल-अनल, मृत्ति-महदम्बर, क्षर-अक्षर भी है.
तू मनुज नहीं, देवता, कांति से मुझे मंत्र-मोहित कर ले,
फिर मनुज-रूप धर उठा गाढ अपने आलिंगन में भर ले.
मैं दो विटपों के बीच मग्न नन्हीं लतिका-सी सो जाऊँ,
छोटी तरंग-सी टूट उरस्थल के महीध्र पर खो जाऊँ.
आ मेरे प्यारे तृषित! श्रांत ! अंत:सर में मज्जित करके,
हर लूंगी मन की तपन चान्दनी, फूलों से सज्जित करके.
रसमयी मेघमाला बनकर मैं तुझे घेर छा जाऊँगी,
फूलों की छन्ह-तले अपने अधरों की सुधा पिलाऊँगी.