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तेरे क़दमों पे सर होगा क़ज़ा सर पे खड़ी होगी / सीमाब अकबराबादी

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 तेरे क़दमों पे सर होगा क़ज़ा सर पे खड़ी होगी|
फिर उस सज्दे का क्या कहना अनोखी बंदगी होगी|
 
नसीम-ए-सुबह गुलशन में गुलों से खेलती होगी,
किसी की आखरी हिचकी किसी की दिल्लगी होगी|
 
दिखा दूँगा सर-ए-महफ़िल बता दूँगा सर-ए-महशर,
वो मेरे दिल में होंगे और दुनिया देखती होगी|
 
मज़ा आ जायेगा महशर में फिर सुनने-सुनाने का,
ज़ुबाँ होगी वहाँ मेरी कहानी आप की होगी|
 
तुम्हें दानिस्ता महफ़िल में जो देखा हो तो मुजरिम,
नज़र आख़िर नज़र है बे-इरादा उठ गई होगी|