भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

"थरथरी सी है आसमानों में / फ़िराक़ गोरखपुरी" के अवतरणों में अंतर

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
(New page: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=फ़िराक़ गोरखपुरी |संग्रह= }} थरथरी सी है आसमानों में<br> ज...)
 
 
(एक अन्य सदस्य द्वारा किया गया बीच का एक अवतरण नहीं दर्शाया गया)
पंक्ति 4: पंक्ति 4:
 
|संग्रह=
 
|संग्रह=
 
}}
 
}}
 +
{{KKCatGhazal}}
 +
<poem>
 +
थरथरी सी है आसमानों में
 +
जोर कुछ तो है नातवानों में
  
थरथरी सी है आसमानों में<br>
+
कितना खामोश है जहां लेकिन
जोर कुछ तो है नातवानों में<br><br>
+
इक सदा आ रही है कानों में
कितना खामोश है जहां लेकिन<br>
+
इक सदा आ रही है कानों में<br><br>
+
कोई सोचे तो फ़र्क कितना है<br>
+
हुस्न और इश्क के फ़सानों में<br><br>
+
मौत के भी उडे हैं अक्सर होश<br>
+
ज़िन्दगी के शराबखानों में<br><br>
+
जिन की तामीर इश्क करता है<br>
+
कौन रहता है उन मकानों में<br><br>
+
इन्ही तिनकों में देख ऐ बुलबुल<br>
+
बिजलियां भी हैं आशियानों में<br><br>
+
  
नातवान = कमजोर<br>
+
कोई सोचे तो फ़र्क कितना है
 +
हुस्न और इश्क के फ़सानों में
 +
 
 +
मौत के भी उडे हैं अक्सर होश
 +
ज़िन्दगी के शराबखानों में
 +
 
 +
जिन की तामीर इश्क करता है
 +
कौन रहता है उन मकानों में
 +
 
 +
इन्ही तिनकों में देख ऐ बुलबुल
 +
बिजलियां भी हैं आशियानों में
 +
 
 +
नातवान = कमजोर
 +
</poem>

18:11, 25 दिसम्बर 2019 के समय का अवतरण

थरथरी सी है आसमानों में
जोर कुछ तो है नातवानों में

कितना खामोश है जहां लेकिन
इक सदा आ रही है कानों में

कोई सोचे तो फ़र्क कितना है
हुस्न और इश्क के फ़सानों में

मौत के भी उडे हैं अक्सर होश
ज़िन्दगी के शराबखानों में

जिन की तामीर इश्क करता है
कौन रहता है उन मकानों में

इन्ही तिनकों में देख ऐ बुलबुल
बिजलियां भी हैं आशियानों में

नातवान = कमजोर