भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

"दर्द को गीत में ढालो कि बहार आई है / 'हफ़ीज़' बनारसी" के अवतरणों में अंतर

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार='हफ़ीज़' बनारसी |अनुवादक= |संग्रह= }}...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)
 
(कोई अंतर नहीं)

23:52, 29 नवम्बर 2019 के समय का अवतरण

दर्द को गीत में ढालो कि बहार आई है
मयकशो जाम उछालो कि बहार आई है
 
मैं सुनाता हूँ नए गीत नए लहन के साथ
तुम उठो साज़ संभालो कि बहार आई है

मह्वशो दीदा-ए-देरीना को पूरा कर दो
बात अब कल पर न टालो कि बहार आई है

उनकी मस्ती भरी आँखें भी यही कहती हैं
आतिशे-शौक़ बुझा लो कि बहार आई है

क्या हो कल सुबह किसे इसकी खबर है यारो
रतजगा आज मना लो कि बहार आई है

उनको रूठे हुए इक उम्र हुई आओ 'हफ़ीज़'
चल के अब उन को मना लो कि बहार आई है