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दूरि गमन से अयलन कवन दुलहा / मगही

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मगही लोकगीत   ♦   रचनाकार: अज्ञात

दूरि गमन[1] से अयलन कवन दुलहा, दुअराहिं भरि गेल साँझ[2] हे।
केने[3] गेल, किआ भेल सुगइ कवन सुगइ, कोहबर के करू न विचार हे॥1॥
एक हम राजा के बेटी, दूसरे पंडितवा के बहिनी, हम से न होतइ बिचार हे।
अतना बचनियाँ जब सुनलन कवन दुलहा, घोड़े पीठे भेलन असवार हे॥2॥
अतना बचनियाँ जब सुनलन कवन सुगइ,
पटुक[4] झारिए झुरिए[5] उठलन कवन सुगइ।
पकड़ले घोरा[6] के लगाम हे।
अपने तो जाहथि[7] जी परभु, ओहे रे तिरहुत देसवा,
हमरा के[8] सौंपले जाएब जी॥3॥
नइहर में हव[9] धनि, माय बाप अउरो सहोदर भाई,
ससुरा में हव छतरीराज[10] हे॥4॥
बिनु रे माय बाप, कइसन हे नइहर लोगवा, बिनु सामी नहीं ससुरार हे।
किआ[11] काम देथिन[12] जी परभु, माय बाप अउरो सहोदर भाई,
चाहे काम देथिन छतरीराज हे?॥5॥

शब्दार्थ
  1. दूर से चलकर
  2. भरि गेल साँझ = संध्या हो गई
  3. किधर
  4. चादर
  5. झाड़कर
  6. घोड़ा
  7. जा रहे हैं
  8. किसे
  9. हैं
  10. क्षत्रियराज
  11. किस, कौन
  12. देंगे