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दृष्टियों / हरीश भादानी

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दृष्टियों !
भागते विस्तार की आहट सुनो,
गंध सूँघों,
गड़ी ही रहो
मर्मस्थली में,
पलक झपते ही
कहीं अलगा न जाए,
दृष्टियों !
साँचे ढले दर्पण
तुम्हारे सामने तैरा करेंगे
ठहरना मत,
उलझना मत
आकृतियों के जड़ाऊ व्यूह
सारे लाँघ जाना
सुनो
दर्पण पारदर्शी नहीं होते कभी भी !