भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

धरणी रीटे साँपीण / गढ़वाली

Kavita Kosh से
Lalit Kumar (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 04:50, 6 सितम्बर 2016 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKLokRachna |रचनाकार=अज्ञात }} {{KKLokGeetBhaashaSoochi |भाषा=गढ़वाली }...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

   ♦   रचनाकार: अज्ञात

धरणी रीटे साँपीण,
अगाश रीटली शीणी,
मणछ मगार लाणदो,
विपता भगवान दीणी।

हसा खाण, बांठी बुलाण,
कोया न बाटुड़ लाणो।
चार दिन मानछड़ो
मरेय न अंयागौर जाणो।

कूण कियो बांठो को मरीणो,
कूणी दुबड़िया लायो रीण।
पापी अपरादी ज्योंरा मेरा,
न माणदो कसी की गीण।

शब्दार्थ