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धूसर मिट्टी की जोत में / लक्ष्मीकान्त मुकुल

पहाड़ों की निर्जन ढलानों से उतरना
कोई अनहोनी नहीं थी उनके लिए
बीड़ी फूंकते मजदूरों की ओर
मुड़ जाती थी फावड़ों की तीखी धर
सरपतों के घने जंगल में दुबके
मटमैले गांवों की गरमाहट से
सांझ दुबकती जाती उंगलियां गिनते
चटखने लगती गलियां
बिच्छुओं के डंक टूगते ही
आसमानी जिस्म पर्दों की ओट में कांपने लगता ।।
छंटने लगती धुंध्ली बस्तियों की
सदियों से लिपटी स्याही
चिड़ियों के चोंच दौड़ जाते
बीछने वन खेतों में उगी मनियां
धूसर मिट्टी की जोत में
अंकुरण का चक्र फिर घूमने लगता।