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नहीं, हरगिज़ नहीं / मदन मोहन दानिश

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मेरे आबाद लम्हों में
मेरी वीरानियों में भी
जो कोई साथ होता है
तो वो बस एक तू ही है
हज़ारों कोशिशें की
तुझपे कोई नज़्म कह डालूँ
कहानी कोई लिक्खूँ
या कि कोई गीत ही रच दूँ
मगर एहसास को तेरे
कोई एक रूप दे देना
मगर विस्तार को तेरे
किसी एक हद में ले आना
नहीं, हरगिज़ नहीं है मेरे बस में
मेरे बस में ...माँ !

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