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नागफनी / के० सच्चिदानंदन

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कांटे मेरी भाषा हैं
मैं अपने होने का उद्घोष करता हूँ
एक रक्तिम स्पर्श के साथ

कभी ये कांटे फूल थे
मैं दगाबाज प्रेमियों से नफरत करता हूँ
कविओं ने मरुस्थल से कन्नी काट ली है
बगीचों की ओर लौटने में
सिर्फ यहाँ ऊँट बचे, और व्यापारी
जो रौंद डालते हैं मेरी लाली को धूल में
पानी की हर दुष्प्राप्य बूँद के लिए एक काँटा
मैं तितलियों को नहीं ललचाता
कोई चिड़िया मेरी प्रशंषा में गीत नहीं गाती
मैं अकाल नहीं उपजाता

मैं एक भिन्न सौन्दर्य रच लेता हूँ
चंद्रमा की रोशनी के पार
सपनों की ओर
एक तीखी, भेदक
प्रतिभाषा

मूल मलयालम से स्वयं कवि द्वारा अंग्रेजी में अनूदित. अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद: व्योमेश शुक्ल