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नागरजा / भाग 4 / गढ़वाली लोक-गाथा

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   ♦   रचनाकार: अज्ञात

सारा गोकुल वासी करद छया
तै इन्द्र की पूजा।
कठा होई गैन तब सब स्ये
कनो बोद तब इन्द्र को बालक-
केकूँ होलू जाज यो हल्ला?
आज गोकुल का लोक,
सुण मेरा बाला करदा इन्द्र की पूजा।
तब बोलदू कृष्ण भगवान-छोड़ा इन्द्र कीपूजा।
आज से करला गोवर्धन पूजा।
लाया गएपूजा को समान,
थालू परात मा मेवा मिष्टान,
षट् रस मीठ रस भोजन,
बार पकवान, बाबन व्यंजन।
घी दूध नैवेद, दीप, धूप, दान,
जौ तिल हवन, पिठैं टीका चंदन।
तब पूछदू कृष्ण भगवान:
इन्द्र क्या कभी तुम दरसन भी देंद?
तब बोलदा गोकुल का लोक-
नी देन्दू इन्द्र, दर्शन नी देन्दू।
तब तुम इन्द्र की पूजा छोड़ा हमेशाक
करी तब त्वैन लीला इनी कृष्ण
गोबर्धन फूटी, उपजे नारैण[1],
जौंका गात पीताम्बर,
भुजा मा मणिबन्ध,
सिर मोर मुकुट, हाथ बांसुली।
दर्शन देंदू दीनों कू दयाल,
मगन होई गैन गोकुल का वासी।
तब इन्द्र माराजा इनो वोद:
ब्रज वासियोंन आज मैं पूजा नी लगाए।
जा मेरा मेघो, ब्रज मा जावा, प्रलै मचावा!
तबरी ही गरजीन मेघ घनघोर,
बिजली कड़के, सरग गिड़के,
बज्र तड़ातड़ तड़केन।
कंपी गये नौखंड धरती थर थर
हा हा मचीगे तै गोकुल मा,
हे कृष्ण तिन यो क्या करे?
कृष्ण भगीवान् तब बोलदा बैन-
गोकुल का लोगू कायरो नी होणू।
तब ऊन गोबर्धन आंगुली मा धरयाले!
गोकुल मा नी पड़े पानी को छीटो।
तब सोचदो इन्द्र क्या ह्वै ह्लो आज?
क्या तै गोकुल ह्वैगे कृष्ण अवतार!
तब इन्द्र माराजन साथ लिन्या
तेतीस करोड़ देव, कामधेनु गाई
चलदा चलदा ऐग्या गोकुल मांज।
कृष्ण भगवान गाई चरौंदा छया,
बंसी बजौदा छा, पृथी मोहदा छा।
कुछ ग्वाल आग छा, कुछ छा पीछ,
गौऊन विर्याँ छा, कृष्ण भगीवान।
तभी करी इन्द्रन गौ को स्वरूप,
बार बार तब परिक्रमा करदू।
ज जै कार करदा पंचनाम देव,
इना रैन कृष्ण भगवान,
गर्वियों गर्व चलैन,
छलियों का छल!

शब्दार्थ
  1. नारायण