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पछतावा / नवीन ठाकुर 'संधि'

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चिड़ियॉ चुनमुन करै छेलै भोरे-भोर,
बुढ़िया रोॅ सुनी केॅ पुलकै छेलै कोरे-कोर।

हौ ऊपर जंगलोॅ रोॅ बीचोॅ में,
हम्में कुरचै छीयै गाछी रोॅ बीचोॅ में।
ओकरोॅ नै समझै छेलियै बोली
रही-रही करै हमरा सें ठिठोली।
चीं-चीं करेॅ अपना में शोर।।
चिड़ियॉ चुनमुन करै छेलै भोरे-भोर।

सूरज निकललै फाड़ी केॅ घोर अंधेरा,
जेन्हॉ देखलकै सब्भै साफ सबेरा।
तैन्हॉ छोड़ी केॅ भागलै सब्भे डेरा,
पछताय केॅ शिकारी तोड़लकोॅ घेरा।
लीला देखै छेलै ‘‘संधि’’ लगायकेॅ जोर।।
चिड़ियॉ चुनमुन करै छेलै भोरे-भोर।