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पिबक्कड़ कौ पछताव / जगदीश सहाय खरे 'जलज'

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नास हो जाबै ऐसौ नसा
करत जो लाखन की दुरदसा
बना दो बिगड़ी फिर सें राम,
नसा कौ कभउँ न लैहैं नाम।

घरै क्वॉरी मौड़ीं हैं सात
कितै सें पीरे करहैं हाँत?
भए मौड़ा सब महा कुजात
रोज थानें बुलवाए जात।

पिबक्कड़ पै नइँ कोउ पतयात
माँगहै घर-घर हाँत पसार,
न मिलहै एकउ टका उधार
चितैहैं हम तर गटा निकार,
भगा दें द्वारेइ सें दुतकार;
हाय अब कैसी करबें राम
जगत्तर भर में भए बदनाम
न रै गओ घर में एक छदाम।

घरउवा घरी-घरी पै रोउत
न छिन भर कभउँ चैन सें सोउत
भोर सें घर-घर गोबर ढोउत
फटौ आँचर अँसुअन सें धोउत
डार कें पानी चुटिया गोउत।

पियत रए हम तौ उतै सराब
कुटुम खौं पी गई इतै सराब
हाय जे घर के लाल गुलाब
हमाए कारन भए खराब।

हाय अब का हूहै करतार?
हूतौ जो सबकौ साहूकार
भिखारी हो गयो बौ घरबार।
लगतौ जी द्वारें दरबार
उतै नइँ कुत्ता ढूँकन आउत
दूर सें हमें देख गुरउित,
बनाए जिनके सौ-सौ काम
भूल गए बे सब दुआ-सलाम।

नसा की जी-जी में लत परी,
जुआनी भइ बाकी अधमरी
जिन्दगी, गगरी है रसभरी,
फोर कें बा गगरी की तरी
नसा नें सबरी बेरस करी।

हाय बौ सावित्री-सी सती
पिबक्कड़ हो गओ बाकौ पती,
बिचारी ऊसइँ दुखिया हती
मरत, बौ कानों जियत रती।
करत ती रोटी ढाँकें मूँड़
पती नें मारो सिलगत डूँड़।
सती तौ हो गइ लोउ-लुहान,
पिबक्कड़ चिपटो रोटी खान।

संग में मरियल लला लुबायँ
सती घर भगी टौरिया तायँ।
सुमिर के पापी पति कौ नाम,
कूँ नीचें सती धड़ाम,
गिरतनइँ हो गओ काम-तमाम।

खड़े ठेका पै बे कबिराज
मंच खौं करैं बसैलौ आज
उतै बे तानसेन महराज
उवाँ रए पीकें, रो रओ साज।

निभा रए जे नेता कौ रोल
नसाबन्दी पै रए जे बोल
देख लो इनकी जेब टटोल
धरें रम की बोतल अनमोल।
देस की जिनके हाँत लगाम
हाय बे बने उमर खइयाम।

करौ होय जीनें बंटाढार
काएखौं मिलहै घर में प्यार
चड़ौ होय छाती फार बुखार
छूटबै बिकट पसीना-धार
पौंछहै नइँ कोउ हाँत पसार।

करौ जब हमनें पाप प्रचण्ड
काए ना मिलहै ऐसौ दण्ड
नसा नें नास करे भुजदण्ड
बोतलें चिलकत धरीं मुचण्ड
करेजे के हो गए सौ खण्ड।

केस हो गए अबइँ सें सेत
हाय, सब चिड़ियाँ चुग गई खेत
फाँकबे रै गइ माटी-रेत
भए हम जिन्दा भूत-परेत,
सुबै क करकें धर दई साम
हाय हम बने जेठ के घाम।

नसा नें सबरे सुख लए लूट,
भाग तौ तबइँ गए ते फूट
पियौ जब हमनें पैलौ घूँट;
काँखरी में पउवा चिपकायँ
पनइयाँ औंठन पै औंदायँ
मूँछ पै सौ माछी भिनकायँ
डरे रत ते द्वारें मौं बायँ।

देख लो मोकों भइया हरौ
नसा नें कैसौ हमखों चरौ
हतौ जो घर सौने सें भरौ
नसा नें बौ घूरे-सै करौ
जिन्दगी हती दसहरी आम
नसा नें गुठली कर दइ, राम।

हाय जौ गंगाजल कौ देस
भोग रओ कैसौ कठिन कलेस,
काए सें, जाँ देखै ताँ नसा
पीतनइँ भूलत घर की दसा
घुसी जी घर में जा करकसा
हो गई बा घर की दुरदसा।

देस में होबै सफल सुराज
न घर-घर गिरै गरीबी गाज
बचै लाखन सतियन की लाज
प्रतिज्ञा कर लो सबरे आज
नसा खौं मानें सदा हराम,
न लैहैं जियत नसा कौ नाम;
तभइँ उलछर पुरखन कौ नाम
बनें भारत सुख-सम्पत धाम
न लैहैं जियत नसा कौ नाम।