भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

"पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है / मीना कुमारी" के अवतरणों में अंतर

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
पंक्ति 17: पंक्ति 17:
 
रात इस तरह, दीवानों की बसर होती है
 
रात इस तरह, दीवानों की बसर होती है
 
   
 
   
ग़म ही दुश्मन है मेरा ग़म ही को दिल ढूँढता है
+
ग़म ही दुश्मन है मेरा, ग़म ही को दिल ढूँढता है
 
एक लम्हे की जुदाई भी अगर होती है
 
एक लम्हे की जुदाई भी अगर होती है
 
   
 
   
पंक्ति 27: पंक्ति 27:
  
 
काम आते हैं न आ सकते हैं बे-जाँ अल्फ़ाज़
 
काम आते हैं न आ सकते हैं बे-जाँ अल्फ़ाज़
तर्जमा दर्द की ख़ामोश नज़र होती है
+
तर्जमा दर्द की ख़ामोश नज़र होती है.
  
 
...
 
...
 
...
 
...
 
...
 
...

09:09, 7 जनवरी 2009 का अवतरण


पूछते हो तो सुनो, कैसे बसर होती है
रात ख़ैरात की, सदक़े की सहर होती है
 
साँस भरने को तो जीना नहीं कहते या रब
दिल ही दुखता है, न अब आस्तीं तर होती है
 
जैसे जागी हुई आँखों में, चुभें काँच के ख़्वाब
रात इस तरह, दीवानों की बसर होती है
 
ग़म ही दुश्मन है मेरा, ग़म ही को दिल ढूँढता है
एक लम्हे की जुदाई भी अगर होती है
 
एक मर्कज़ की तलाश, एक भटकती ख़ुशबू
कभी मंज़िल, कभी तम्हीदे-सफ़र होती है

दिल से अनमोल नगीने को छुपायें तो कहाँ
बारिशे-संग यहाँ आठ पहर होती है

काम आते हैं न आ सकते हैं बे-जाँ अल्फ़ाज़
तर्जमा दर्द की ख़ामोश नज़र होती है.

...
...
...