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पूजा गोवर्धन की करि लै / ब्रजभाषा

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   ♦   रचनाकार: अज्ञात

अरी तेरे सब संकट कटि जायें, पूजा गोवर्धन की करिलै॥ टेक
अड्डे पै भीर बड़ी हो, मोटर नाँय एक खड़ी हो।
अरी तू चल दै चालम चाल,
पूजा गोवर्धन की करिलै॥ अरी.
जा मानसी गंगा नहियो, गिर्राज कूँ माथ नवइयो।
और फिर परिकम्मा कू जाय,
पूजा गोवर्धन की करिलै॥ अरी.
परिकम्मा में मिलें भिखारी, दीजो भिक्षा उनकूँ डारी।
अरी तू पुन्य बड़ौ ही पाय,
पूजा गोवर्धन की करिले॥ अरी.
मन्दिर जो बीच पड़िंगे, पइसा एक-एक चढ़िंगे।
अरी तू दर्शन करती जाय,
पूजा गोवर्धन की करिले। अरी.
जब आवै पूछरी को लौठा, बिन खाय जो पड़ौ सिलौठा॥
अरी वाय चरनन सीस झुकाय,
पूजा गोवर्धन की करिलै॥ अरी.
जब राधाकुण्ड कूँ जाबें, वहाँ दोनों कुण्ड में नहावैं।
अरी तेरे पाप सभी धुल जाँय,
पूजा गोवर्धन की करिलै॥ अरी.
तू लौट गोवर्धन आवै, श्रम तेरौ सब हर जावै,
अरी जब मानसी गंगा नहाय,
पूजा गोवरधन की करिलै॥ अरी.
पूजा कौ थाल सजइयो, बर्फी को भोग लगइयो।
मुकुट गिर्राज कू शीश नवाय,
पूजा गोवरधन की करिलै॥ अरी.
गिरिराज से ध्यान लगावे, मन वांछित फल तू पावे॥
अरी चह ‘नन्दन’ कहत सुनाय,
पूजा गोवरधन की करिलै॥ अरी.