भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

बंगोमुंडा की मिट्टी / हरिशंकर बडपंडा / दिनेश कुमार माली

Kavita Kosh से
आशिष पुरोहित (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 17:00, 25 अक्टूबर 2012 का अवतरण

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

रचनाकार: हरिशंकर बडपंडा (1938)

जन्मस्थान: बोलांगीर

कविता संग्रह: पद्मतोलार काव्य(1982),रक्तजातक ओ केतोंटि श्रद्धांजलि (1984),उदयोत्सव (1985),सबु परिचित पृथ्वी (1998), वसुधार काव्य (2003),उच्चारण (2006),तिनि पाद पृथ्वी (2007)


(अकालग्रस्त बंगोमुंडा बोलांगीर जिले का एक गाँव)

बंगोमुडा की माटी में
श्रावण महीने में धूल उड़ती है
फाल्गुन महीने में आम-पेड़ों से मंजरी झड़ती है
वैशाख महीने में चक्रवात चलते हैं
जो पेड़-पौधों , जीव-जंतुओं
माया- मोह, स्नेह-ममता को
इकट्ठा करके ऊँचे आकाश में

किसको किस समय- असमय में
किस दिशा में उड़ा देता है , पता भी नहीं चलता ।

मिट्टी में माँ की आसक्ति- अनुरक्ति
इस मोक्ष प्रदायिनी माँ के
अनन्य आत्मप्रसाद से खिलते हैं
कमल की तरह चरागाह
या रसातल होकर लौटते हैं
वही ध्यान, ज्ञान, दर्शन
उनके बिना जीवन निरर्थक
जीवन-मोह की अनन्य अश्रुधारा से

इस प्रकार बहती है वह
जिस पर न्योछावर सारे कूल , किनारे , कर्मवृति

बिन बादलों के आकाश को देख
भिक्षाथाली फैलाने पर भी जब
पानी की एक बूंद नहीं मिलती है
तब सारे प्राण, प्रज्ञा, प्रवाह स्थिर हो जाते हैं!!

बंगोमुंडा की मिट्टी
रानीपुर झरीयल
चौंसठ योगिनी मंदिर
इंद्रलाठ मंदिर, स्वयंभू शिव लिंगेश्वर
पद्मपोखरी के तट पर सिद्ध योगी आश्रम
सभी एक जगह करते समय
मिट्टी माँ का सपना, स्नेह, सुहाग
धूल की आंधी बनकर आकाश में उड़ जाता है
अनन्य तरीके से अचानक पहुँच से परे

इस मिट्टी के अंदर जीवन की खोज में
जिन्होंने भी खून के आँसू बहाएँ
अपने कर्मों को संवारा ।
वे खुद भी ढह जाते हैं
श्रावण महीने की आंधी में।
या वैशाख के ग्रीष्म में .
बंगोमुंडा की मिट्टी में,
फूल खिलना चाहने से भी खिल नहीं पाते हैं
फल पकना चाहने से भी पक नहीं पाते हैं
मंजरी आम बनना चाहने से भी बन नहीं पाती है
आँखों से आँसू बहना चाहने से बह नहीं पाते है ।
मरुद्वीप के अनुसंधान में जो भी कमर कसकर बाहर निकले
वे गए तो गए कभी लौटे ही नहीं
हर तरफ संदेह, अस्पष्ट चित्रपट
मिट्टी माँ की माया-मरीचिका का।
इस अद्भुत दृश्यपट पर भी
कई जन गणतंत्र के नाम पर बंगोमुंडा की मिट्टी को
गिद्ध की तरह नोंच-नोंचकर खाते हैं
यद्यपि उनकी पोखरियों में अभी भी
पानी छलकता हैं , कमल के फूल खिलते हैं
आम के पेड़ों पर मंजरी लगती है, आम पकते हैं
तथापि बंगोमुंडा का चक्रवात
काली छाया बनकर
उन्हें झपट लेने के लिए
अभी भी इंतजार करता है
अभी भी दम रखता है।