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बदलती रुत का सितम सब पे एक जैसा था / मेहर गेरा

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बदलती रुत का सितम सब पे एक जैसा था
झड़े जो बर्ग तो हर एक पेड़ तन्हा था

तमाम उम्र रहा उसको अब्र का एहसास
न जाने कौनसी रुत में वो शख्स भीगा था

उसे खुशी के सफ़र का अज़ाब खत्म हुआ
मुझे ये ग़म कि भरे शहर में अकेला था

ये ज़िन्दगी तो है इक मुस्कुराहटों का सफ़र
ये जान कर ही वो हर हादसे पे हंसता था

हरेक रंग ही उसका था माइले-गुफ्तार
जहां जहां से भी देखा उसे वो चेहरा था।