भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

बन्दा नवाज़ियों पे खु़दा-ए-करीम था / अमीर मीनाई

Kavita Kosh से
Gcgupta (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 03:08, 12 अप्रैल 2015 का अवतरण

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

 

बन्दा-नवाज़ियों पे ख़ुदा-ए-करीम था
करता न मैं गुनाह तो गुनाह-ए-अज़ीम था

बातें भी की ख़ुदा ने दिखाया जमाल भी
वल्लाह क्या नसीब जनाब-ए-कलीम था

दुनिया का हाल अहल-ए-अदम है ये मुख़्तसर
इक दो क़दम का कूच-ए-उम्मीद-ओ-बीम था

करता मैं दर्दमन्द तबीबों से क्या रजू
जिस ने दिया था दर्द बड़ा वो हक़ीम था

समाँ-ए-उफ़्व क्या मैं कहूँ मुख़्तसर है ये
बन्दा गुनाहगार था ख़ालिक़ करीम था

जिस दिन से मैं चमन में हुआ ख़्वाहे-ए-गुल 'अमीर'
नाम-ए-सबा कहीं न निशान-ए-नसीम था