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बन्द करो, बन्द करो, बन्द करो, यह विकास ! / मृत्युंजय

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बस्तरिया मैना कण्ठ में उग आए काँटें
मस्त मगन अरना भैंसा थक कर के चूर हुआ
मैनपाट में जल-समाधि ले ली नदी ने
गहरी और छोटी वन मेखलाएँ जिनका अभी नाम भी नहीं पड़ा
पहली बार लादी गईं नँगी कर रेलों में
सूर्य को देखे बिना बीत गई जिनकी उमर
उन वन-वृक्षों की छालें उतारकर
रखी गई गिरवी
घोटल समुदायगृहों पर हुई नालिश
कैसी आई है ऋतु अबकी बसन्त में

अबकी वसन्त में टेसू के लाल फूल
सुर्ख़-सुर्ख़ रक्त चटख झन-झन कर बज उट्ठे
ख़ून की होली जो खेली सरकार बेकरार ने

वृक्षों के पुरखों ने प्राणों की आहुति दी
प्रस्तर चट्टानों से शीश पटक धरती में दब गए
सबकुछ कुर्बान किया
मान दिया
निर्धन सन्ततियों को दीं अपनी अस्थियाँ
लाखों बरस की इस सम्पदा की नीलामी होने को है अब

चतुर-चटुल पूँजीपति, पुरातत्ववेत्ता सँग
दुनिया के नौवें धनी-मानी-अम्बानी
वेदों के अन्त के ठेकेदार, सब आए
छत्तीस सरदारों की बलिवेदी
आज तीर्थाटन की
बनी हुई पुण्यभूमि-पितृभूमि
आये सब कुशल-क्रूर, कर्मीं, कर्ता-धर्ता मुल्क के
अबकी वसन्त में

लोकतन्त्र की गाय के तोड़ दिए चारों पैर
नाक में नकेल डाल
उलट दिया
पथरीली धरती पर
कुहनियों से कोंचते हैं मन्त्रीगण बार-बार
बारी अब दुहने की आई है
खौफ़ से भरी माँ
कातर आवाज़ में बिन बछड़ा रम्भाती रही
बाँऽऽऽ बाँऽऽऽ बाँऽऽऽ
सोचते हैं दूर तलक नज़र गाड़
चिदम्बरम, मनमोहन, मोण्टेक, रमन सिंह
टेकेंगे कब घुटने वन-जँगल वासी ये
जैसे हो, जल्दी हो !

अबकी वसन्त में
अपने ही शस्त्रों से, अस्त्रों से
हत्या की इतनी पुरानी इबारत
जँगल की छाती पर कुरेद रही पुलिस-फ़ौज
मीठी मुस्कान पगे पुलिसपति
मन्त्री सँग फ़ोटो उतरवाने लगे

वृक्षों के चरणों को सीने से भींचकर
नदियों के बालू से अन्तरतम सींचकर
कबीर वहीं बैठा है
तलवों में बिन्धा है बहेलिये का आधा बाण
पीर की कोई आवाज ही नहीं आती
सहमा बारहसिंहा
बड़ी बड़ी आँखों में कातर अवरोह लिए ताक रहा ।

नाश से डरे हुए जँगल ने उनके भीतर
रोप दीं अपनी सारी वनस्पतियाँ
आग न लग जाए कहीं, वन्ध्या न हो जाए धरती की कोख
सो, अकुलाई धरती ने शर्मो-हया का लिबास फेंक
जिस्म पर उकेरा खजाने का नक़्शा
आँखों में लिख दिया पहाड़ों ने
अपनी हर परत के नीचे गड़ा गुप्त ज्ञान
कुबेर के कभी न भरने वाले रथ पर सवार हो
आए वे उन्मत्त आए
अबकी वसन्त में
उतार रहे गर्दन ।

अबकी वसन्त में
हड़पी गई ज़मीनों की मृतआत्माएँ
छत्तीस सरदारों के कन्धे पर हैं सवार
दम-साध
गोल बान्ध
क़दमताल करते अभुवाते हैं
छत्तीस सरदार
अपने जल-जँगल-ज़मीन बीच
नाचते बवण्डर से
दिल्ली से रायपुर राजधानी एक्सप्रेस
के चक्कों को कन्धा भिड़ा रोक-रोक देते हैं
नोक गाड़ देते हैं, सर्वग्रासी विकास की छाती में

पर जीने की यही कला
दूर तलक काम नहीं आती है
सहम-सहम जाती है
रक्त सनी लाल-लाल मट्टी
अबकी वसन्त में
गोली के छर्रे सँग बिखर गई आत्मा
छत्तीस सरदारों की

छत्तीस कबीलों के छत्तीस हज़ार
महिलाएँ और पुरुष सब
एक दूसरे से टिकाए पीठ, भिडाए कन्धा
हाथों में धनुष धर एकलव्य के वंशज
फन्दा बनाते हैं पगलाए नागर-पशु-समुदाय की ख़ातिर
मरना और मरना ही धन्धा है इस नगरी
ठठरी की प्रत्यँचा देह पर चढ़ाते हैं
बदले की आँच में हवा को सिंझाते हैं
दिल्ली तक

बन्द करो !
बन्द करो !
बन्द करो !
यह विकास ।