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बरसों के बाद जब वह मिले, दिल धड़क उठे / दरवेश भारती

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बरसों के बाद जब वह मिले, दिल धड़क उठे
लब तो खमोश थे, मगर आँसू छलक उठे

बादे-सबा ने सहने-चमन पर किया करम
शबनम का तोहफ़ा पाते ही गुंचे चटक उठे

इक-दूसरे को कह दिया किसने न जाने क्या
रह-रहके दोनों सिम्त से मोती टपक उठे

रानाई आफताब-सी जब-जब हुई नसीब
गौहर यहाँ थे जो भी वह पल में दमक उठे

हो जाये उसका रह्मो-करम जब भी दोस्तो
एक, एक उदास फ़ूल खुशी से महक उठे

साजन को भी निहारना हो जाये है कठिन
नीचे गिरे कभी, कभी ऊपर पलक उठे

मिस्मार-से रहे जो बुझी आग की तरह
 'दरवेश' वक़्त आया तो वह भी धधक उठे