भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

बसन्ती रँगवाय दूंगी / ब्रजभाषा

Kavita Kosh से
Lalit Kumar (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 03:53, 27 नवम्बर 2015 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKLokRachna |रचनाकार=अज्ञात }} {{KKLokGeetBhaashaSoochi |भाषा=ब्रजभाष...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

   ♦   रचनाकार: अज्ञात

बसन्ती रंगवाय दूँगी जा लाँगुरिया की टोपी॥
जो लाँगुर तौपै कपड़ा नाँयें, जो लाँगुर तौपे...
कपड़ा तोय दिवाय दूँगी, जा लाँगुरिया की टोपी...॥
बसन्ती रंगवाय दूँगी.
जो लाँगुर तोपे सिमाई नायें, जो लाँगुर,
सिमाई मैं मरवाय दूँगी, जा लाँगुरिया की टोपी...॥
बसन्ती रंगवाय दूँगी.
जो लाँगुर तोपे कुर्ता नायें, जो लाँगुर,
दुपट्टा फारि सिमाय दूँगी, जा लाँगुरिया की टोपी...॥
बसन्ती रंगवाय दूँगी.