Last modified on 13 अप्रैल 2016, at 14:48

बसी है मेरे भीतर कोई कुब्जा / शिव ओम अम्बर

बसी है मेरे भीतर कोई कुब्जा,
तरन-तारन कन्हाई चाहता हूँ

पड़े थे जो सुदामा के पगों में,
वो छाले वो बिवाई चाहता हूँ।

सभा में गूँजती हों तालियाँ जब,
सभागृह से विदाई चाहता हूँ।