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बहरों को यहाँ सही कौन करें / आकिब जावेद

बहरो को यहाँ सही कौन करें॥
गूँगों से कहा सुनी कौन करें॥

मेरी हर बात जब लगती है बुरी॥
बात-बात में कहा सुनी कौन करें॥

खर्च कर डाला है खुद को खुद॥
जीने की चाह को पूरी कौन करें॥

है डिग्रियाँ बोझ-सी सब लदी हुई
क़िरदार को अपने सही कौन करें॥

झूठ फ़रेब सबसे जबसे बनने लगा
अब सच की इख़्तियारी कौन करें॥