भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

बातों-बातों में बात कर आए / रवि सिन्हा

Kavita Kosh से
अनिल जनविजय (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 22:06, 1 दिसम्बर 2018 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=रवि सिन्हा |अनुवादक= |संग्रह= }} {{KKCatGha...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

बातों-बातों में बात कर आए 
आज हम भी उन्हें नज़र आए 

आज कुछ रौशनी-सा बरसा है 
आज हम धुल सँवर निखर आए 

हम कहीं और जा पहुँचते हैं 
जब कभी आपके शहर आए

जिनका क़िस्सा है ग़ैर हैं वो तो
फिर भी क्यूँ आँख अपनी भर आए
 
याद करते हैं रोज़ मुद्दत से
याद वो फिर भी रात भर आए 

जो है आज़ार[1] वो ही चारागर[2]
दर पे बीमार के अगर आए

उम्र भर उस से चोट खाई है
अब तो दुश्मन कहीं नज़र आए 

तेरा जल्वा हुज़ूरे-नाबीना[3] 
तेरे जलसे में बेख़बर आए 

ये भी मुमकिन है सूरमा-ए-ज़ुबान 
तेरा हर तीर लौटकर आए  

सुर्ख़ ख़ुर्शीद[4] बेशरर[5] डूबा 
जाने कैसी यहाँ सहर[6] आए

हाल सारे जहाँ का सुनते हैं 
काश अपनी भी कुछ ख़बर आए

शब्दार्थ
  1. रोग (illness)
  2. इलाज़ करने वाला (healer)
  3. अन्धे की निगाह तले (in the sight of the blind)
  4. सूरज (the sun)
  5. बिना चिनगारी के (without sparks)
  6. सुबह (morning)