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बिती गयो नि रात / म. वी. वि. शाह

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छटपट गरेर नै सधैँ बिती गयो नि रात
छटपट गरेर नै सधैँ…

दिनमा पनि कहाँ म पाउँछु र चैन
तसबीर उनकै सामने आएर दिनरात
छटपट गरेर नै सधैँ….

आई गयो वसन्त; गृष्म, वर्षा पनि
आँशु बनेर नै गयो शरद्को चाँदनी
आँशु बनेर नै गयो….

हेमन्तको बतासमा गयो निराश आश
शिशिरको तरूसरी सारा शरीर छ लाश
छटपट गरेर नै सधैँ….