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बुझाए रखना / जय गोस्वामी / रामशंकर द्विवेदी

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इस समय तुम्हारी चर्चा
चलाता नहीं हूँ,
जहाँ तक हो सके
चुप ही बना रहता हूँ

मेरे लिखने का कोई मूल्य नहीं,
सच कह रहा हूँ,

जीवन में मेरे
आलोक कहने को एकमात्र
बाक़ी तुम हो

हालाँकि उस आलोक को
रोज़ ही
फूल और गंगा जल से
बुझाए ही रखता हूँ
बड़े जतन से ।

मूल बाँगला भाषा से अनुवाद : रामशंकर द्विवेदी