भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

बुतान-ए-माहवश उजड़ी हुई मंज़िल में रहते हैं / दाग़ देहलवी

Kavita Kosh से
Pratishtha (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 19:43, 29 जनवरी 2008 का अवतरण (New page: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=दाग़ देहलवी }} बुतान-ए-माहवश उजड़ी हुई मंज़िल में रहते ...)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

बुतान-ए-माहवश उजड़ी हुई मंज़िल में रहते हैं
के जिस की जान जाती है उसी के दिल में रहते हैं

हज़ारों हसरतें वो हैं कि रोके से नहीं रुकतीं
बहोत अर्मान ऐसे हैं कि दिल के दिल में रहते हैं

ख़ुदा रक्खे मुहब्बत के लिये आबाद दोनों घर्
मैं उन के दिल में रहता हूँ वो मेरे दिल में रहते हैं

ज़मीं पर पाँव नख्वत से नहीं रखते परी-पैकर
ये गोया इस मकाँ की दूसरी मंज़िल में रहते हैं

कोई नाम-ओ-निशाँ पूछे तो ऐ क़ासिद बता देना
तख़ल्लुस "दाग़" है और आशिक़ों के दिल में रहते हैं