भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

बूँद बन-बन के बिखरता जाए / शीन काफ़ निज़ाम

Kavita Kosh से
अनिल जनविजय (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 13:42, 22 अगस्त 2009 का अवतरण

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

बूँद बन-बन के बिखरता जाए
अक्स आईने को भरता जाए

बन के कल-कल जो गुज़रता जाए
अपने वादे से मुकरता जाए

एक ही लय में बहे जाता है
और लगता है ठहरता जाए

शहर सागर का भी हमज़ाद[1] कहाँ
मौज दर मौज बिफरता जाए

अक्स माकूस[2] हुआ है जब से
अपनी नज़रों से उतरता जाए

एक नदी है कि रुकती ही नहीं
एक तूफ़ान उतरता जाए

एक कोंपल में सिमटने के लिए
पेड़ का पेड़ बिखरता जाए

शब्दार्थ
  1. एक से स्वभाव
  2. प्रतिबिंब