भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

"भरी बज़्म में मीठी झिड़की / घनश्याम चन्द्र गुप्त" के अवतरणों में अंतर

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=घनश्याम चन्द्र गुप्त |अनुवादक= |स...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)
(कोई अंतर नहीं)

04:30, 13 अप्रैल 2015 का अवतरण

ग़ज़ल

हर दाने पर मोहर लगी है किसने किसका खाया रे
फिर भी उसका हक बनता है जिसने इसे उगाया रे

अपना सब कुछ देकर उसको हमने दामन फैलाया
वो छू दे तो लोग कहेंगे इसने सब कुछ पाया रे

एक दरीचा, एक तबस्सुम, एक झलक चिलमन की ओट
हुस्ने-ज़ियारत के सदके से सारा जग मुस्काया रे

एक गया तो दूजा आया ऐसा चलन यहां का है
कैसा हंसना, कैसा रोना, सुख दुःख का माँ जाया रे

भरी बज़्म में मीठी झिड़की, दादे-सुखन, अन्दाज़े-निहां
"मेरे दिल की बात ज़ुबां पर तू कैसे ले आया रे ?"

हमने तो बस एक सिरे से पकड़ी ऐसी राह तवील
तू बतला ये रिश्ता तूने कितनी दूर निभाया रे

नापा-तोला समझा-बूझा परखा फिर अन्दाज़ किया
सब नाकारा सब बेमानी प्रीतम जब मन भाया रे

ब्रह्म सत्य है केवल, बाकी जग का सब जग मिथ्या है
ब्रह्मस्वरूप जीव को हर पल नचा रही है माया रे
 

५-११ फरवरी २०१३