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"भरी बज़्म में मीठी झिड़की / घनश्याम चन्द्र गुप्त" के अवतरणों में अंतर

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ग़ज़ल
 
 
 
हर दाने पर मोहर लगी है किसने किसका खाया रे
 
हर दाने पर मोहर लगी है किसने किसका खाया रे
 
फिर भी उसका हक बनता है जिसने इसे उगाया रे
 
फिर भी उसका हक बनता है जिसने इसे उगाया रे
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५-११ फरवरी २०१३
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०५फरवरी २०१३
 
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11:11, 14 अप्रैल 2015 के समय का अवतरण

हर दाने पर मोहर लगी है किसने किसका खाया रे
फिर भी उसका हक बनता है जिसने इसे उगाया रे

अपना सब कुछ देकर उसको हमने दामन फैलाया
वो छू दे तो लोग कहेंगे इसने सब कुछ पाया रे

एक दरीचा, एक तबस्सुम, एक झलक चिलमन की ओट
हुस्ने-ज़ियारत के सदके से सारा जग मुस्काया रे

एक गया तो दूजा आया ऐसा चलन यहां का है
कैसा हंसना, कैसा रोना, सुख दुःख का माँ जाया रे

भरी बज़्म में मीठी झिड़की, दादे-सुखन, अन्दाज़े-निहां
"मेरे दिल की बात ज़ुबां पर तू कैसे ले आया रे ?"

हमने तो बस एक सिरे से पकड़ी ऐसी राह तवील
तू बतला ये रिश्ता तूने कितनी दूर निभाया रे

नापा-तोला समझा-बूझा परखा फिर अन्दाज़ किया
सब नाकारा सब बेमानी प्रीतम जब मन भाया रे

ब्रह्म सत्य है केवल, बाकी जग का सब जग मिथ्या है
ब्रह्मस्वरूप जीव को हर पल नचा रही है माया रे
 

०५फरवरी २०१३