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भेष (वेष) / शब्द प्रकाश / धरनीदास

धरनी प्रभु के कारने, लोग धरत है भेष।
भेस भला संसार ते, भेसहु माँह विवेक॥1॥

अंगविभूति लगायके, कमर कसी तरुवारि।
धरनी प्रभु माने नहीं, ऐसो भेस फुसारि॥2॥

कुल तजि भेस बनाइया, हृदय न आयो साँच।
धरनी प्रभु रीझै नहीं, देखत ऐसी नाँच॥3॥

भेस लियो दाया नहीं, ध्यान धतूरा भोग।
धरनी प्रभु कच्चा नहीँ, भूतल ऐसो स्वाँग॥4॥

धरनी[1] पहिले भजन ले, तापाछे करु भेष।
निर्दाया निर्पच्छ होई, तत्व-तमाशा देख॥5॥

पारस लागे साधु को, तबलोँ भेस न होय।
धरनी साँची कहतु है, कायर जियरा सोय॥6॥

शब्दार्थ
  1. हुनर पैदा कर ठवल तर्क कीजो तब लिबास अपना।