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मंगलेश जी से प्रेरित दो कविताएं / कुमार मुकुल

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== मुक्तिबोध ==

( मंगलेश डबराल की कविता 'मुक्तिबोध स्मृति -1' से प्रेरित )

तीस साल पहले
भाषा के आंगन में
तेरे मुकाबिल होना
निज की आश्‍वस्ति की तरह था
कि भीतर के अंधेरे को जानने
और उसे उर्जा में बदलने का तेरा हुनर
आज भी साथ है मेरे

तेरे बाद मैं
उस अहाकवि से भी मिला
जिसने किसी स्‍टेशन पर
तुम्‍हारे द्वारा दी गयी पूड़ी सब्‍जी को
तुम्‍हारी आंख बचा पटरी पर फेंक दिया था
और तुम्‍हारा सबसे बड़ा संस्‍मरणकार होता चला गया था

इस हाइटेक युग में
तुम्‍हारे समय का गाढा अंधेरा
आज मुंह छिपाता फिर रहा
और भविष्‍य अस्‍पष्‍ट होता जा रहा

अब कोई मृत्‍यु दल नहीं है
पर मौतें
जीवन के मानी बनती जा रही हों जैसे
और डोमा जी की जगह
बस उस्‍ताद नजर आ रहे

आज ना कोई जलूस है ना शोभा यात्राएं हैं
अब बस 'लोकतंत्र का अंतिम क्षण है'
जो विराट होता जा रहा
और जिसका गवाह होने की योग्‍यता
खोते जा रहे सब जन-गण-मन

अब वे अभेद्य दीवारें शेष नहीं
जिनके मध्‍य हमारी बेचैनी पलती थी
और पहलू बदला करती थी
आभासी जगत के अदृश्‍य कैमरे
हमारी हर उहापोह दर्ज करने को बेताब हैं।


== मुक्तिबोध स्मृति -1 - मंगलेश डबराल ==
  
मैं तुमसे कभी मिल नहीं पाया
मेरे साथ के बहुत से लोग तुमसे नहीं मिल पाए
हम सिर्फ उस अँधेरे से मिले
जो तुम्हारे जाने के बाद और ज्यादा अँधेरा था
हम उस विकराल जुलूस से मिले जो मृत्यु-दल की तरह था
और ज्यादा विकराल
हमने डोमा जी उस्ताद को देखा
जो उस शोभा-यात्रा में आगे-आगे चलता था
बल्कि कई डोमा जी उस्ताद थे छोटे-छोटे बगलगीर
और कोई था जो दिखाई नहीं देता था
सिर्फ सुनाई देता था
ज़िंदगी के अँधेरे कमरों में बेचैन
चक्कर लगाता था वह बार-बार लगातार
लेकिन उसे दर्ज करने वाला अब कोई नहीं था.


== नेटरा हाथ ==
  
( मंगलेश डबराल की एक कविता पढकर। )

लेटा पढता होता हूं
तो किताब उठाये रखता है दाहिना
और हल्के थामे नेटरा
पलटता चलता है पन्ना
लिखते लिखते रूक जाती है कलम
तब होंठों को सुसराता है नेटरा
जैसे जानता हो किधर छुपे हैं भाव
फिर कलम सरकते
ठुड्डी से अड देखता है निस्पंद
लिखते दाहिने केा
जैसे खबर ही ना हो कुछ
सोते चिंतक की मुद्रा में
माथे पर पडा होता है दाहिना
तब नेटना लेटा रहता है
अनपढ प्रिया सा पास ही
कहीं सुरसुरी होती तो सहलाता
फिर दाहिने की अंगुलियों में
अंगुलियां फंसा
मनौवल करता सा सो जाता

झगडा झांटी में
लपक लेता दाहिना
कॉलर किसी का
तो अनहोनी के भय से कांपता नेटरा
विनती करने लगता ईश्वर से
बॉस को यंत्र सा
सैल्यूट दागता दाहिना
तो शर्म आती नेटने को
और बगल छिपने की कोशि‍श करता वह

मित्रों से भेंट बखत
पछताता नेटरा
विदा की बेर भी
उछल उछल देर तक
हाथ हिलाता दाहिना ही
बछडे की पीठ भी वही सहलाता

पर गाय दूहना हो या समाज
नेटरे को घसीट लेता साथ वह
सारी गंदगी साफ कराता उसी से
और थमा देता रूमाल
लो पडे रहो ल‍िपटे बांयी जेब में

कभी तो चुनौती ही दे देता नेटरा
कि रस्सी बंटने से बेलचा चलाने तक
बंदूक थामने से बोझ उठाने तक
है कोई काम जो हो बगैर नेटरा के

एक दिन मुझे लगा
कि दम है नेटरा में
तो पकडा दिया कलम
कि उतारे प्रेमगीत कोई
बिचकती अंगुलियों से

तब बना दिये उसने
कौए के टांग कई
बचपन में जैसा
लिखा करता था दाहिना

तब साहूकार से
लाया सिलेट पिनसिन
पकडाया नेटरा को
भारी भारी सा
लग रहा था उसे
कि बहाना कर रहा था वह
मैंने समझाया
भारी है
तो रख दो जमीन पर
और लिखो
पालथी मार कर लिखो।

शब्दार्थ