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मन ललचाता ही रहे / त्रिलोक सिंह ठकुरेला

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मन ललचाता ही रहे, भरे हुए हों कोष।
आता है सुख-चैन तब,जब आता संतोष॥
जब आता संतोष,लालसा जरा न रहती।
रात-दिवस अविराम, सुखों की नदिया बहती।
'ठकुरेला' कविराय, तृप्ति संतोषी पाता।
कभी न बुझती प्यास,व्यक्ति जब मन ललचाता॥