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मरते गेल्यां कौण मरै से यो जिंवते जी का प्यार हो सै / मेहर सिंह

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गजना

बणी बणी का सब कोए साथी ना बिगड़ी का यार होसै
मरते गेल्यां कौण मरै से यो जिंवते जी का प्यार हो सै।टेक

एक राजा कै चार पूत थे मैं था सबतैं छोटा
पिता बोल्या खाओ किसकै कर्म का अन्न प्राणी लोटा
मैं बोल्या खां आपणे कर्म का नफा रहो चाहे टोटा
इतणी सुण कै मेरे पिता नै लिख्या बारा साल दसोटा
वो तो सारा कुणबा नजर बदलग्या मतलब का संसार हो सै।

फेर पांच सात दिन मंजिल काट कै मैं गजपुर कै म्हं आग्या
बियाबान मैं फिरूं भरमता बच्चा था घबराग्या
एक बुढ़ा सा मणयार आणकै मनैं पुचकारण लाग्या
बेटा करकै घरां ले आया उस बुढ़ीया कै मन भाग्या
ईब थारे शहर म्हं करण लागग्या जो मणियारे की कार होसै।

चूड़ी बेचण चाल पड़्या चाल पड़्या मैं सर पै गाठड़ी ठाकै
थोड़ी सी दूर मणियार छोड़ग्या आच्छी तरहां समझाकै
राजमहल की ऊंची पैड़ी रूक्का मार्या जाकै
उस गजना नै बांदी भेज दी लेगी मनैं बुलाकै
रूप देख कै पागल होग्या प्रेम घणां लाचार हो सै।

दुःख सुख तै रहण लागगे ना आपण भेद छिपाया
हंस मुखी नै जा चुगली खाई अपणा पिता सीखाया
यूं बोली तेरी गजना दे नै मणियारा पति बणाया
मैं भेज संतरी कैदी कर लिया राजा नै पास बुलाया
फांसी का मेरा हुक्म दिया जित लग्या हुअया दरबार हो सै।

हाथ हथकड़ी पायां म्हं बेड़ी तौंक गले म्हं जड़कै
उस राजमहल के आगे कै लेज्यां थे जल्लाद पकड़ कै
झांकी के म्हं गजना बेठी न्यूं बोली बाहर लकड़ कै
फांसी के तख्ते पै खड़ी मोहताज मिलूंगी तड़कै
कहै मेहर सिंह मरती बरियां बी ना आई के इन बीरां का एतबार हो सै।