भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

माटी कोड़े गेली हम आज मटिखनमा / मगही

Kavita Kosh से
Sharda suman (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 17:34, 14 जुलाई 2015 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKLokRachna |भाषा=मगही |रचनाकार=अज्ञात |संग्रह= }} {{KKCatMagahiR...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

मगही लोकगीत   ♦   रचनाकार: अज्ञात

माटी कोड़े गेली[1] हम आज मटिखनमा[2]
इयार[3] मोरा पड़लन, हाय जेहलखनमा[4]॥1॥
पियवा के कमइया[5] हम कछु न जान ही।
इयार के कमइया नकबेसर[6] हुई[7] हे ननदो[8]॥2॥
ओही नकबेसर धरी इयार के छोड़यबो[9]
इयार मोरा पड़लन हाय जेहलखनमा॥3॥

शब्दार्थ
  1. गई
  2. मिट्टी वाली खान, जिस खान गढ़े से मिट्टी निकाली जाती है
  3. यार, प्रेमी
  4. जेलखाना, कारागृह
  5. कमाई, उपार्जन
  6. नाक में पहना जाने वाला एक आभूषण
  7. है
  8. ननद पति की बहन
  9. छुड़ाऊँगी।