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मुँजी के घर बिन दान पुन्न, व्यर्था धन सुन्ना है / हरीकेश पटवारी

मुँजी के घर बिन दान पुन्न, व्यर्था धन सुन्ना है,
शील सब्र सन्तोष दया बिन, आदम तन सुना है || टेक ||

सुन्नी राजा बिन राजधानी, रैयत सारी सुन्नी,
मतलब कारण प्रेम करै, वह प्रीति यारी सुन्नी,
किले कोट घर पड़े पुरुष बिन, महल अटारी सुन्नी,
सुन्ने फूल बिना खुशबोई, केशर क्यारी सुन्नी,
पति बिन नारी सुन्नी, दामन बिन धन सुन्ना है ||

हिरदा सुन्ना ज्ञान बिन, और दान बिना कर सुन्ना,
कुआ जोहड़ तालाब नीर बिन, समझ सरासर सुन्ना,
ज्ञान अक्ल चतुराई विद्या बिन, मूर्ख सुन्ना,
पूत सपूत और पतिव्रता नारी बिन, घर सुन्ना,
शुरवीर बिन शस्त्र सुन्ना, शुरे बिन रण सुन्ना है ||

सेल सिपर तलवार कटारी, तीर अणि बिन सुन्ने,
खेल तमाशे मेले झेले, भीड़ घणी बिन सुन्ने,
सुन्ने बालक मात पिता बिन, ढोर धणी बिन सुन्ने,
बड़े बड़ेरे सुन्ने बताते, नाग मणि बिन सुन्ने,
शेर बणी बिन सुन्ने, और केहरी बिन बण सुन्ना है ||

जहाँ पुरुष की कदर नही वहाँ, आणा जाणा सुन्ना,
शर्म लिहाज बिन बुढ़ा, बालक याणा स्याणा सुन्ना,
विधवा नारी का गिरकणा, बाणा लाणा सुन्ना,
सुन्नी पिंगल बिन कविताई, मुह बाणा गाणा सुन्ना है,
कहै हरिकेश खाणा सुन्ना, घी बिन भोजन सुन्ना है ||