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"मुकद्दमा / कविता भट्ट" के अवतरणों में अंतर

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अरे साहेब!
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'''एक मुकद्दमा तो उस शहर पर भी बनता है'''
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जो हत्यारा है–
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सरसों में प्रेमी आँख-मिचौलियों का
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और उस उस मोबाइल को भी घेरना है कटघरे में 
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जो लुटेरा है–
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सरसों सी लिपटती हँसी-ठिठोलियों का
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हाँ-
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उस एयर कंडीशन की भी रिपोर्ट लिखवानी है
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जो अपहरणकर्त्ता है-
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गीत गाती पनिहारन सहेलियों का
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और उस मोबाइल को भी सीखचों में धकेलना है
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जो डकैत है-
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फुसफुसाते होंठों-चुम्बन-अठखेलियों का
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उस विकास को भी थाने में कुछ घंटे तो बिठाना है
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जिसने गला घोंटा;
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बासंती गेहूं-जौ-सरसों की बालियों का;
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लेकिन इनका वकील खुद ही रिश्वत ले बैठा है
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फीस इनसे लेता है;
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और पैरोकार है शहर की गलियों का
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ओ साहेब!
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आपकी अदालत में पेशी है इन सबकी
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कुछ तो हिसाब दो -
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उन मारी गयी मीठी मटर की फलियों का
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17:34, 15 अगस्त 2019 के समय का अवतरण


अरे साहेब!
एक मुकद्दमा तो उस शहर पर भी बनता है
जो हत्यारा है–
 सरसों में प्रेमी आँख-मिचौलियों का
और उस उस मोबाइल को भी घेरना है कटघरे में
जो लुटेरा है–
 सरसों सी लिपटती हँसी-ठिठोलियों का
 हाँ-
उस एयर कंडीशन की भी रिपोर्ट लिखवानी है
जो अपहरणकर्त्ता है-
गीत गाती पनिहारन सहेलियों का
और उस मोबाइल को भी सीखचों में धकेलना है
जो डकैत है-
फुसफुसाते होंठों-चुम्बन-अठखेलियों का
उस विकास को भी थाने में कुछ घंटे तो बिठाना है
जिसने गला घोंटा;
बासंती गेहूं-जौ-सरसों की बालियों का;
लेकिन इनका वकील खुद ही रिश्वत ले बैठा है
फीस इनसे लेता है;
और पैरोकार है शहर की गलियों का
ओ साहेब!
आपकी अदालत में पेशी है इन सबकी
कुछ तो हिसाब दो -
उन मारी गयी मीठी मटर की फलियों का
                   -0-