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म्हारे आँगण हरी रे दरोब / मालवी

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   ♦   रचनाकार: अज्ञात

म्हारे आँगण हरी रे दरोब
नितकी चूंटूं, ने नित पानवे
ऐसा हमारा फलाणा राय सिरदार
जात जिमावे, भोग्या जग करे
घर में बऊ लाड़ी बोलिया
सुनो हमारा अलीजा सरदार
अपनी बेन्या बई खे लावजी
गेल्या मारूणी निपट गंवार
तमारे बेन्यां बई खे नई बणे
राखां बई ने दिन दोय-चार
चूनड़ ओढ़ई ने बई खे मोकलां।