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यंत्रों का मर्म / रुडयार्ड किपलिंग / तरुण त्रिपाठी

हमें अयस्क की परत और खान से निकाला गया
हमें भट्ठियों और गड्ढों में गलाया गया
हमें आकार देने के वास्ते पीटा और गढ़ा और ढाला गया
हमें व्यवस्थित करने के वास्ते काटा और तराशा और साधा और मापा गया
थोड़ा पानी, कोयला, और तेल ही बस है हमारी माँग
और थोड़ी सी जगह हमारे खेल के लिए
और अब, अगर आप हमें काम पर लगा दें
हम आपको चार धन बीस घंटे सेवा देंगे एक दिन में

हम खींच और घसीट और धकेल और उठा और चला सकते हैं
छपाई और जुताई और बुनाई और ऊष्मा और उजाला कर सकते हैं हम
हम दौड़ और भाग और तैर और उड़ और गोते लगा सकते हैं
देख और सुन और गिन और पढ़ और लिख सकते हैं हम

क्या आप पृथ्वी के दूसरे गोलार्ध से अपने दोस्त से संपर्क करेंगे?
अगर आप हमें उसका नाम, कस्बा और राज्य बता दें
आप देखेंगे और सुनेंगे अपना धड़कता सवाल उछाला जाता हुआ
स्वर्ग के मेहराब की तरफ, और आप इंतज़ार करें
क्या उसने जवाब दिया? क्या उसे वहाँ आपकी ज़रूरत है?
आप ये तुरंत उसी शाम शुरू कर सकते हैं अगर आप चाहें
और पश्चिमी सागर सत्तर हज़ार घोड़ों और कुछ नालों के फलांग में समा लिया जाएगा

वो द्रुतगामी जहाज आपके आदेश का इंतज़ार कर रही है
आप उस मॉरिटानिया[1] को वहीं घाट पर पाएँगे
जब तक कि उसका कप्तान हत्था नीचे नहीं करता हाथ से
और ये विकराल नौ तलों का शहर समुद्र में उतर जाता है

क्या आप पहाड़ों का सिर नंगा करना चाहते हैं,
और उनके नए कटे वनों को बिछा देना पाँव तले?
क्या आप उलटना चाहते हैं किसी नदी का प्रणाल
या किसी बंजर उजाड़ पर उगाना है गेहूँ?
क्या हम उस ऊँचाई से लगा दें पाइपें, और पानी ला दें,
कभी अभाव में न रहने वाले बर्फ के अक्षय-पात्र से,
चलाने के लिए आपके नगर की मिलें और ट्राम-रेलें
और इसके प्रवाह से सींचने के लिए आपके उद्यान?

यह आसान है! हमें कुछ डायनामाइट और ड्रिलें दे दीजिये!
और फौलादी कंधों वाली चट्टानों को देखिये झुकते और थरथराते हुए
जैसे कि प्यासी मरुभूमि भर जाती है बाढ़ से
और हमारी बाँध बनायी घाटियों में झीलें बन जाती हैं

लेकिन याद रखें, वह रीति जिस से हम रहा करते हैं
हम किसी झूठ में शामिल होने के लिए नहीं बनाये गए हैं
हम प्रेम नहीं कर सकते न तो दया न ही क्षमा
अगर आप हमारे संचालन में कहीं चूके तो मरे!
हम लोगों से और राजाओं से भी ऊपर हैं
नम्र रहें, जब आप हमारी छड़ों के नीचे से रेंगें
हमारी छुअन से बदल सकती है सब बनी-बनाई चीज़ें
पृथ्वी पर हम सबकुछ हैं― सिवा उस ईश्वर के

भले हमारे धूएँ से छिप जाए आपकी आँखों से वो स्वर्ग
लेकिन यह लुप्त होगा, और सितारे दुबारा चमकेंगे
क्योंकि, हमारी सारी शक्ति और भार और आकार के लिहाज़ से
हम आपके मस्तिष्क की संतानों के सिवा कुछ भी नहीं हैं

  1. 1906 में समुद्र में उतारी गई एक ब्रिटिश यात्री जहाज, उस वक़्त की सबसे बड़ी और तेज..('किपलिंग' सत्तर हज़ार अश्व-शक्ति इसी की क्षमता बताते हैं).