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"याद तुम्हारी आती है / प्रतिभा सक्सेना" के अवतरणों में अंतर

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तब मेरे मन को याद तुम्हारी आती है !
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मधुमय वसन्तश्री राग लुटाती आती है
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गुन-गुन के गुंजन में वन की डाली-दाली
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अमराई की डालों से उठती कूक पिकी की आकुलता
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तब मेरे मन को याद तुम्हारी आती है !
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कोई अंधा भिक्षुक जिसका घर-बार नहीं ,
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गा उठता कोई करुण मधुर संगीत
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कि दाता जो देदे वह होगा अस्वीकार नहीं !
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अभिमानी मन का मान डोल उठता है जब ,
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तब मेरे मन को याद तुम्हारी आती है !
 
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08:57, 28 फ़रवरी 2011 के समय का अवतरण

जब पलकें झपका कर नभ में तारे हँसते,
 तब मेरे मन को याद तुम्हारी आती है !


जब झूम-झूम उठते फूलों के दल के दल ,
मधुमय वसन्तश्री राग लुटाती आती है
गुन-गुन के गुंजन में वन की डाली-दाली
,सौरभ मधु से मधुपों की प्यास मिटाती है ,
अमराई की डालों से उठती कूक पिकी की आकुलता
तब मेरे मन को याद तुम्हारी आती है !
 
जब किसी द्वार पर अपनी झोली फैला कर ,
कोई अंधा भिक्षुक जिसका घर-बार नहीं ,
गा उठता कोई करुण मधुर संगीत
कि दाता जो देदे वह होगा अस्वीकार नहीं !
अभिमानी मन का मान डोल उठता है जब ,
तब मेरे मन को याद तुम्हारी आती है !