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यूँ तिरछी नज़र से सहम देखता है / बलजीत सिंह मुन्तज़िर

यूँ तिरछी नज़र से सहम देखता है ।
क्या जाने वो मुझमें अहम[1] देखता है ।

चुराता है उसका कोई चैन नित ही[2],
वो अपनी वफ़ा पे वहम देखता है ।

फ़कत मैं नहीं हूँ असीरे तजल्ली[3],
मेरे संग दीया भी अलम[4] देखता है ।

वो बीती किताबों मैं तितली या गुल की,
बजाय पुरानी नज़्म देखता है ।

क्यूँ हलके से लेता है मेरी इनायत[5],
क्यूँ होके मुझे खुशफ़हम देखता है ।

मुझे क्या पता था के मुझ सुर्खरू[6] मैं,
वो इक चाँदनी दम-ब-दम देखता है ।

नहीं उसको कुछ भी मलाल[7] अब किसी से,
वो अपनी खताएँ[8] पैहम[9] देखता है ।

कभी अपने दिल की गिरह[10] खोलता है,
कभी मुझमें वो पेचोखम[11] देखता है ।

शब्दार्थ
  1. महत्वपूर्ण
  2. रोज़ाना
  3. रौशनी मैं क़ैद, रौशनी से परेशान
  4. अन्धेरा
  5. कृपादृष्टि
  6. कामयाब, सफल
  7. नाराज़गी
  8. गलतियाँ
  9. लगातार, निरन्तर
  10. गाँठ
  11. उलझनें, मोड़