भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

यूँ तिरछी नज़र से सहम देखता है / बलजीत सिंह मुन्तज़िर

Kavita Kosh से
अनिल जनविजय (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 13:02, 25 नवम्बर 2014 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=बलजीत सिंह मुन्तज़िर |अनुवादक= |स...' के साथ नया पन्ना बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

यूँ तिरछी नज़र से सहम देखता है ।
क्या जाने वो मुझमें अहम[1] देखता है ।

चुराता है उसका कोई चैन नित ही[2],
वो अपनी वफ़ा पे वहम देखता है ।

फ़कत मैं नहीं हूँ असीरे तजल्ली[3],
मेरे संग दीया भी अलम[4] देखता है ।

वो बीती किताबों मैं तितली या गुल की,
बजाय पुरानी नज़्म देखता है ।

क्यूँ हलके से लेता है मेरी इनायत[5],
क्यूँ होके मुझे खुशफ़हम देखता है ।

मुझे क्या पता था के मुझ सुर्खरू[6] मैं,
वो इक चाँदनी दम-ब-दम देखता है ।

नहीं उसको कुछ भी मलाल[7] अब किसी से,
वो अपनी खताएँ[8] पैहम[9] देखता है ।

कभी अपने दिल की गिरह[10] खोलता है,
कभी मुझमें वो पेचोखम[11] देखता है ।

शब्दार्थ
  1. महत्वपूर्ण
  2. रोज़ाना
  3. रौशनी मैं क़ैद, रौशनी से परेशान
  4. अन्धेरा
  5. कृपादृष्टि
  6. कामयाब, सफल
  7. नाराज़गी
  8. गलतियाँ
  9. लगातार, निरन्तर
  10. गाँठ
  11. उलझनें, मोड़