Last modified on 28 जुलाई 2015, at 17:27

राइ जमाइन दादी निहूछे देखियो रे कोइ नजरी न लागे / मगही

मगही लोकगीत   ♦   रचनाकार: अज्ञात

राइ[1] जमाइन[2] दादी निहूछे[3] देखियो रे कोइ नजरी न लागे।
सँभरियो[4] रे कोइ नजरी न लागे॥1॥
राइ जमाइन मइया निहूछे, देखियो रे कोइ नजरी न लागे।
सँभरियो रे कोइ नजरी न लागे॥2॥
राइ जमाइन चाची निहूछे, देखियो रे कोइ नजरी न लागे।
सँभरियो रे कोइ नजरी न लागे॥3॥
राइ जमाइन भउजी निहूछे, देखियो रे कोई नजरी न लागे।
सँभरियो रे कोइ नजरी न लागे॥4॥

शब्दार्थ
  1. छोटी सरसों, जो कुछ बैंगनी रंग की होती है
  2. अजवायन, एक प्रसिद्ध पौधा; जिसके दाने दवा और मसाले के काम में आते हैं
  3. निछावर करती हैं, एक प्रकार का टोटका
  4. सँभालना