भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

रैनबसेरा / हरीश करमचंदाणी

Kavita Kosh से
Neeraj Daiya (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 05:11, 25 मई 2011 का अवतरण (नया पृष्ठ: <poem>दिन भर के थके पावों ठिठुरती देह और पेट की दकती आग के साथ जब मैंन…)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

दिन भर के थके पावों

ठिठुरती देह
और पेट की दकती आग के साथ जब मैंने प्रवेश किया
रैनबसेरा चिढा रहा था मेरा मुहँ
यह रही तुम्हारी दरी
यह रहा तुम्हारा कम्बल
यह रहा तुम्हारा आज का कोना
बिछाओ ,लेटो और सो जाओ
हाँ ,जबकि उनकी साजिश थी
मैं भी सो सो जाऊँ
भूख ने मुझे जगाये रखा