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वहीं तक पाँव हैं मेरे, जहाँ तक है दरी मेरी / ललित मोहन त्रिवेदी

वहीं तक पाँव हैं मेरे, जहाँ तक है दरी मेरी !
इसी में सब समेटा है, यही जादूगरी मेरी !!

हमें निस्बत गुलाबों से, वो है गुलकंद का हामी !
बचेगी पाँखुरी कैसे, किताबों में धरी मेरी ?

खरी तो सुन नहीं सकते, किताबों से दबे चहरे !
यहाँ पर काम आजाएगी, शायद मसखरी मेरी !!

निशाना जो तेरा बेहतर, नहीं कम मार अपनी भी !
तेरा खंज़र बजेगा और, बजेगी खंज़री मेरी !!

ये जिद भी है कि अपना बीज, मिटटी में दबाऊँ क्यों !
शिकायत ये भी है, होती नहीं धरती हरी मेरी !!

किसी को हो न हो लेकिन, मुझे पूरा भरोसा है !
पड़ेगी एक दिन बांसों पै, भारी बाँसुरी मेरी !!