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विस्मय / जगदीश जोशी / क्रान्ति कनाटे

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यह तो बीज में से फूटी है डाल
कि पत्ते-पत्ते में प्रकटा पाताल !

पूरा आकाश मेरी आँखों में जागता,
लिए पँखी के सुर का सुवास
तिनके-तिनके में है पँखों का स्पर्श यहाँ
ओस का भीना उजियार ।
एक-एक बून्द में है समन्दर की मौज
या कि एक-एक पत्ते में प्रकटा पाताल ।

झूमती कलियों में राधा की वेदना
और खिले फूलों में रहता है श्याम
शाखों से झाँकती धूप में देख ली
कहीं मैंने अपनी भावना ललाम ।
पल-पल की पलकों में मुस्काए त्रिकाल
या कि एक-एक पत्ते में प्रकटा पाताल ।

मूल गुजराती से अनुवाद : क्रान्ति कनाटे